Om Birla के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव, 39 साल बाद परीक्षा

अजमल शाह
अजमल शाह

दिल्ली की संसद में आज बहस सिर्फ शब्दों की नहीं, कुर्सी की है. करीब चार दशक बाद पहली बार लोकसभा के स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सदन के एजेंडे में है. और जिस कुर्सी पर यह सियासी परीक्षा होने जा रही है, उस पर बैठे हैं
Om Birla. सवाल सीधा है क्या यह सिर्फ राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन है या सच में स्पीकर की कुर्सी पर भरोसे का संकट?

39 साल बाद स्पीकर पर अविश्वास

संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में आज का एजेंडा लगभग एक ही मुद्दे पर टिका है. लोकसभा सचिवालय ने स्पीकर Om Birla को हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को सदन की कार्यसूची में शामिल कर लिया है.

यह प्रस्ताव पेश किया है Mohammad Jawed, K. Suresh और Mallikarjun Ravi ने.

सत्ता और विपक्ष दोनों तैयार

संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju ने कहा है कि करीब 39 साल बाद स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव सदन में चर्चा के लिए आ रहा है. सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर ली है. राजनीति में अक्सर बहस लंबी होती है लेकिन यहां मामला सीधे विश्वास बनाम अविश्वास का है.

विपक्ष ने जारी किया व्हिप

मुख्य विपक्षी दल Indian National Congress ने अपने सांसदों को तीन दिन का व्हिप जारी किया है. 9 से 11 मार्च तक हर सांसद को सदन में मौजूद रहने का आदेश दिया गया है. जो अनुपस्थित रहेगा उस पर पार्टी की अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है.

प्रस्ताव के लिए जरूरी संख्या

संसदीय नियमों के मुताबिक स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तभी स्वीकार होगा जब कम से कम 50 सांसद खड़े होकर इसका समर्थन करें. इसके बाद ही सदन में इस पर औपचारिक चर्चा और मतदान होगा.

किन दलों का समर्थन

विपक्ष का दावा है कि इस प्रस्ताव को करीब 118 सांसदों का समर्थन मिल चुका है. इसमें Trinamool Congress ने भी अब समर्थन दे दिया है. हालांकि Sharad Pawar की पार्टी Nationalist Congress Party ने अभी अपना अंतिम रुख सार्वजनिक नहीं किया है.

असली सियासी संदेश क्या है

स्पीकर की कुर्सी पर अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ संसदीय प्रक्रिया नहीं होता. यह एक राजनीतिक संकेत भी होता है कि विपक्ष सरकार और सदन के संचालन से कितना असंतुष्ट है. और संसद की राजनीति में कभी-कभी संख्या से ज्यादा संदेश मायने रखता है.

संसद में आज का दिन क्यों अहम

आज की बहस सिर्फ एक प्रस्ताव तक सीमित नहीं रहेगी. यह तय करेगी कि संसद के भीतर भरोसे की राजनीति कितनी मजबूत है और विपक्ष की रणनीति कितनी प्रभावी. दिल्ली की संसद में आज जो होगा वह सिर्फ रिकॉर्ड में नहीं जाएगा आने वाली राजनीति के संकेत भी देगा.

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